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Friday, February 10, 2012

Amitabh Bachchan Story in Doctor Diary




शरद ठाकर,अहमदाबाद।फिल्म का नाम याद नहीं लेकिन इस फिल्म का एक डॉयलॉग शब्दश: याद है, जिसमें फिल्म के नायक अमिताभ बच्चन बोलते हैं 'पैसे आते नहीं, पैसे पैदा किए जाते हैं।' इस जालिम जमाने में पैसे उगाहने के तरीकों में मैं पड़ना नहीं चाहता। लेकिन बच्चन साहब की रौबदार और दादागिरी भरे अंदाज में बोले गए ये शब्द मुझे बहुत पंसद हैं।

1973-74 में देखी फिल्म 'दीवार' का एक दृश्य भी मुझे छू गया था। इस फिल्म में स्मगलर इफ्तेखार जब अमिताभ के काम से खुश होकर अपना ऑफिस उनके हवाले कर देते हैं, तब अमित एक पल के लिए ऊंची इमारत के कांच से बाहर सड़क पर नजर दौड़ाते हैं और उनकी आंखों के सामने उनके दुखद अतीत के दृश्य आ जाते हैं। उनकी गरीब मां कपड़ों की पोटली और दो बच्चों के साथ मुंबई की सड़कों पर भिखारी की तरह भटक रही है और बड़े बेटे के हाथ पर लिखा हुआ है : 'मेरा बाप चोर है।'

ये क्षण अमित के मन में चल रहे द्वंद्व के क्षण हैं। कहते हैं गलत रास्ते पर जाने से पहले मनुष्य का उसकी अंतरात्मा एक बार संवाद जरूर होता है। अमित पहला दृश्य याद कर स्मगलर का यह मुख्य ओहदा स्वीकारने के लिए तैयार हो जाते हैं।

इफ्तेखार तो वहां से चला जाता है, लेकिन इसके बाद अमित गद्दीदार रिवॉल्विंग चेयर पर बैठकर अदाओं के साथ देबल पर अपने पैर फैला लेते हैं और उनकी इस हरकत से अनेक संदर्भ अपने आप प्रकट हो जाते हैं। जब मैंने यह फिल्म (दीवार) देखी, तब मेरी उम्र 19 वर्ष थी। मैं तब फर्स्ट एम.बी.बी.एस में था। लेकिन इस फिल्म में अमिताभ का अभिनय और बोले गए उनके एक-एक शब्द और संवाद ने मुझ पर इतना असर किया कि लगातार तीन दिन तक मैंने यह फिल्म दो-दो बार देखी थी, जबकि वार्षिक परीक्षा मेरे सिर पर थी।

सलीम-जावेद की जोड़ी ने कितने जोशीले संवाद लिखे थे कि लंबे, दुबले-पतले अमिताभ और उनकी नई तरह की हेयर स्टाइल के कारण वे इतने हैंडसम, स्मार्ट और डायनैमिक लगते थे कि आज तक उनके सामने बड़े-बड़े सुपर स्टार बगले झांकते हुए नजर आते हैं। अमिताभ को यह नया हेयर लुक हबीब नामक हेयर-आर्टिस्ट ने दिया था, जो फिल्म 'जंजीर' में पहली बार दिखाई दिया।

फिलहाल हम बात कर रहे थे - 'बहुत कम मेहनत' और 'बहुत कम समय' में 'बहुत से पैसा' कमाने की। अमिताभ का यह फिल्मी डॉयलॉग उनकी व्यक्तिगत जिंदगी से भी जुड़ा हुआ है। दरअसल अमिताभ का बचपन सीमित ऐशो-आराम में ही व्यतीत हुआ है। पिता हरिवंशराय बच्चन इलाहाबाद में अध्यापक थे तो सीधी सी बात है कि पगार भी सीमित थी।

माता तेजी बच्चन एक उच्च स्तर की लाइफ स्टाइल में जीने वाली महिला थीं। उनकी सोच अलग ही तरीके के थी। घर भले ही किराए का हो, लेकिन होना बड़े आकार का चाहिए। कपड़े भले ही कम हों, लेकिन अच्छी क्वालिटी के होने चाहिए। घर में तीज-त्यौहारों-पार्टियों का बोलबाला था। इसके अलावा घर की सजावट, रंगों की पसंद, और साथ ही उन्हें फोटोग्राफी और बागवानी का भी बहुत शौक था। कवि पिता कितना भी कमाएं लेकिन इन खर्चों के आगे तो बहुत थोड़े ही थे।

इन परिस्थितियों में ही अमिताभ की जिंदगी से दो प्रसंग जुड़ते हैं कि उस समय नन्हा अमिताभ क्या सोचता होगा। उसके दिल में अधिक से अधिक पैसा कमाने की कामना कब जन्मी होगी या नहीं?

ये हैं वे प्रसंग-
पहला प्रसंग इलाहाबाद का ही है। तेजी दोनों बच्चों के साथ मुश्किलों से घर का खर्च चला रही थीं क्योंकि पति विलायत में रहकर पीएचडी कर रहे थे। विलायत में पढ़ाई का निर्धारित समय पूरा हो चुका था, तभी कवि ने विचार किया कि इलाहाबाद वापस जाकर पीएचडी करने की बजाय विलायत में ही कुछ महीने और रहकर पीएचडी कर ली जाए। इसलिए अब उनका खर्च पहले की तुलना में बढ़ गया था।

इधर तेजी को आर्थिक तंगी की वजह से अपना घर तक बेचना पड़ गया। तेजी से बच्चों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दैनंदिन खर्चों पर भी बड़े पैमाने पर कटौती कर दी और अपने सारे शौक व इच्छाओं को दरकिनार कर दिया। इधर विलायत में कवि को तो इस बारे में कुछ भी पता नहीं था। जब उनका भारत वापसी का समय आया तो उन्होंने तेजी को पत्र द्वारा अपने आने की खबर की और कहा कि वह बच्चों के साथ उन्हें रिसीव करने बंदरगाह पर आए तो उन्हें बहुत अच्छा लगेगा।

लेकिन तेजी ने जवाब में कहा कि आपको लेने के लिए मैं बंदरगाह तक नहीं आ सकती। कवि मुंबई उतरकर ट्रेन से इलाहाबाद पहुंचे। घर पहुंचकर पत्नी और बच्चों से मुलाकात की। पिता खिलौनों में अमित के लिए विलायत से एयरगन लाए थे तो छोटे बंटी के लिए पांच डिब्बों वाली चाभी भरने वाली ट्रेन लाए थे। दोनों बच्चों इन खिलौनों से बहुत खुश हो गए।

रात के खाने के बाद सब सोने चले गए। बंटी तो इस समय तक सो चुका था, लेकिन अमित को अभी तक नींद नहीं आई थी और उसके कान माता-पिता की बातों पर लगे हुए थे।

कवि बच्चन ने तेजी से कहा, 'तुमने पत्र में लिखा था कि तुम मुझे रिसीव करने बंदरगाह पर नहीं आ सकती, लेकिन फिर भी मुझे आशा थी कि तुम आओगी। जब मैं स्टीमर से उतरा तो मेरी आंखें तुम्हें ही ढूंढ़ रही थीं। तुम वहां पर क्यों नहीं आईं?'

जवाब देते समय तेजी रो पड़ीं और कहा 'तुम्हें पता है कि घर की आर्थिक स्थिति कैसी हो चुकी है? आज रात में हमने जो खाना खाया, वह बासा खाना था। घर में अनाज का एक दाना भी नहीं बचा है। तुम्हें रिसीव करने के लिए इलाहाबाद से मुंबई तक जाने का किराया कहां से लाती?' तेजी के ये शब्द सुनकर कवि स्तब्ध रह गए और विलायत से पीएचडी लाने की जो खुशी थी, वह एक ही पल में छिन्न-भिन्न सी हो गई, माथे पर शिकन उभर आई और उन्होंने अब कसमसाती हुई आवाज में कहा, घर की ऐसी हालत हो गई और तुमने मुझे अंधेरे में रखा। अगर तुमने मुझे पहले बता दिया होता तो मैं अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर सीधा यहां चला आता।

इधर दूसरी तरफ माता-पिता की ये बातें सुन-सुनकर अमित गुस्से की आग में जल रहा था लेकिन वह रो नहीं पा रहा था। उसके दिमाग में इस दुनिया के खिलाफ गुस्सा था कि पिता की क्या गलती है इसमें? किसलिए इतने अच्छे कवि और इतने अच्छे इंसान को भी ईश्वर ने इस दुखदायी अवस्था में रखा? और किसलिए निम्र स्तर के लोगों को भी ईश्वर अकूत दौलत से नवाजता है? मतलब यह सीधा द्वंद्व अमिताभ और ईश्वर के बीच में शुरू हो गया।

वैस अगर हम अपनी बात करें तो हमारे लिए तो 'एंग्री यंगमैनÓ का जन्म हिंदी सिनेमा के परदे पर 1973-74 फिल्म 'दीवार' से हुआ। हकीकत में 'एंग्री लिटल मैन' का जन्म तो 1954 की 5 जुलाई की मध्य रात्रि कवि हरवंशराय बच्चन के बैडरूम में ही हो चुका था। मां को रोते देख जब अमित ने अपनी मुठ्ठियां कसीं तब उनकी उम्र सिर्फ 12 वर्ष थी।

दूसरे दिन सुबह अमित के हाथ में पिता की दी हुई एयरगन (खिलौना) थी और दिमाग में विचार यह था कि, इससे पहले किसे मारूं? एक बच्चे के दिमाग में उपजा यह द्वंद्व किसी को मारने-पीटने का नहीं था, बल्कि यह वह समय था जब अमित के मन में बहुत सारा पैसा कमाने की इच्छा आकार ले रही थी। आंखें एक स्वप्र देख रही थीं और यह स्वप्र था - हाथों में लाखों रुपए होने और पिता के जेबें हीरे-मोतियों से छलका देने का।

अब बात करते हैं दूसरे प्रसंग की- यह घटना दिल्ली की है, इस बारे में तो स्वयं अमिताभ भी एक बार लिख चुके हैं। पंडित नेहरू के प्रयासों से बच्चन परिवार इलाहाबाद से दिल्ली आ गया था और अब इसके साथ ही घरखर्च भी बढ़ गया। इसलिए अब अमिताभ के कवि पिता को अपनी आय बढ़ाने के लिए कवि सम्मेलनों में भी जाना पड़ता।

पूरे दिन की नौकरी की थकान और कवि सम्मेलनों में देर रात का जागरण और इस पर भी 'दिल्ली की सर्दी'। शाम होते ही अपनी साइकिल से बच्चन घर से निकल जाते और पत्नी तेजी से कह जाते कि आने में देर हो जाएगी। मुन्ना और बंटी को खाना खिलाकर सुला देना।

बच्चन कवि का कवि सम्मेलनों में अक्सर देर हो जाने का मुख्य कारण उनकी लोकप्रियता थी और उनकी 'मधुशाला' काव्य कृति को सुनने के लिए ही लोगों की भीड़ जमा होती थी। अगर बच्चन अपनी यह कविता सम्मेलन में शुरुआत में ही सुना दिया करते तो देर रात तक भीड़ फिर रुकती ही क्यों। इसीलिए वे यह कविता सम्मेलन के अंत में सुनाया करते थे और उन्हें घर आने में अक्सर देर हो जाया करती थी।

दिल्ली की कड़कड़ाती सर्दी मे गर्म कोट पहने बच्चन ठिठुरते और दांत किटकिटाते हुए घर पहुंचते, तब तक छोटा बेटा बंटी सो जाया करता, लेकिन अमित का पिता से बहुत लगाव था, इसलिए उसकी आंखें पिता की राह देखती रहतीं। हालांकि मां के कड़क आदेश कि खाना समय पर खाना चाहिए, इस पर उनका बस नहीं चला करता, तो वे खाना तो खा लिया करते, लेकिन पिता के इंतजार में जागते जरूर रहते थे।

कवि सम्मेलनों से बच्चन अक्सर रात दो बजे तब घर आ पाते तो दरवाजा खुलवाने के लिए उंगलियों से बस धीरे-धीरे दरवाजे पर ठक-ठक किया करते। क्योंकि उन्हें लगता कि अगर दरवाजे की कुंडी बजाई तो दोनों बच्चे नींद से जाग जाएंगे। तेजी, पति का इंतजार करती रहती थीं तो हल्की सी आवाज में ही तुरंत दरवाजे तक पहुंच जाया करतीं। बच्चन अपना कोट उतारकर एक खूंटी पर टांग देते और जेब से कवि सम्मेलन में कमाए 30 या 40 रुपए पत्नी तेजी के हाथों में थमा दिया करते। इसके बाद एक लंबी सांस खींचते हुए कहते - 'ये पैसे कमबख्त बड़ी मुश्किल से आते हैं।'

लगभग 14 वर्षीय अमित ये सारी बातें-दृश्य चुपचाप लेटे-लेटे सुनता और निहारता रहता और पिता की इस जी-तोड़ मेहनत से उसे बहुत दुख होता। फिर अमित के दिमाग में यही बात आती कि काश मैं इतना पैसा कमाऊं कि पिता की जेंबे नोटों से भरी रहें और उन्हें इस तरह कठिन परिश्रम न करना पड़े। मतलब फिर उनका समाज और ईश्वर से द्वंद्व होता।

'ये पैसे कमबख्त बड़ी मुश्किल से आते हैं।'
आखिरकार समय के चक्र ने अपनी दिशा बदली.. अब अमित, अमित नहीं रहा, बल्कि पूरा देश उसे अमिताभ बच्चन के नाम से जानने लगा। पैसों की आवक नहीं, बल्कि बरसात होने लगी।

अब का दृश्य देखिएः
अमिताभ अपने बंगले (प्रतीक्षा) में पहुंचकर विदेशी कोट उतारते और उसे सौफे पर फेंकत हुए ब्रीफकेस से चालीस लाख रुपए के नोटों के बंडल निकालकर पत्नी के हाथ में देते। (यह रकम अब चार करोड़ तक पहुंच गई) और फिर प्रतीक्षा के ग्राउंड फ्लोर पर स्थित एकमात्र बेडरूम की दिशा में देखते हुए पिता का कहा गया यही वाक्य दोहराते - 'ये पैसे कमबख्त बड़ी मुश्किल से आते हैं!'

अतिम इस बेडरूम की इसलिए देखा करते क्योंकि इसी बेडरूम में कवि हरवंशराय बच्चन सोया करते थे। आज सोचता हूं कि अतिमाभ बच्चन नामक सुपर स्टार की कितनी प्रसिद्धी है... इतने सारे अवार्डस, इतनी लोकप्रियता और हिट फिल्मों की नामावली, क्या यही है बिग बी की प्रसिद्धी...?

लेकिन मैं उनकी इस प्रसिद्धि को नहीं, बल्कि उनकी जिद को ज्यादा मानता हूं, समाज और ईश्वर से हुए उनके उस द्वंद्व को ज्यादा मानता हूं जो बीस वर्ष पहले हुए था। क्योंकि बचपन में ईश्वर को दी हुई चुनौती को उन्होंने आखिरकार हकीकत में बदल डाला।

...और इसलिए वह शख्स सिर्फ अमिताभ ही हैं जिन्हें यह कहने का अधिकार है: 'पैसे आते नहीं, पैसे पैदा किए जाते हैं।'

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