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Thursday, June 7, 2012

दांतों की बनावट से जानिए भविष्य

पंक्तिबद्ध दांत- सौभाग्य तथा ऐश्वर्य के प्रतीक हैं। ऐसे व्यक्ति जीवन में हर प्रकार का सुख भोगते हैं। सुशील तथा सज्जन वृत्ति के होते हैं।

टेढ़े-मेढ़े दांत- संघर्ष तथा असफलता का चिह्न हैं। ऐसे व्यक्ति सत्य वक्ता नहीं होते तथा छल-कपट से जीवन निर्वाह करते हैं।

सामने के दांतों में छिद्र- जिस पुरुष के सामने के दो दांतों में छिद्र होता है वह बड़ा भाग्यशाली, बुद्धिमान, विद्वान तथा परोपकारी होता है, परंतु जिस स्त्री के दांतों में छिद्र हो वह दुर्भाग्य का सामना करती है, वैधव्य का संताप भोगती है तथा हर प्रकार से दुखी रहती है।

सामने वाले दो बड़े दांत- भाषण में प्रवीणता दर्शाते हैं। ऐसे व्यक्ति शत्रु का नाश करने वाले तथा आदर्श जीवन व्यतीत करने वाले होते हैं।

दांतों की पंक्तियां ऊपर-नीचे ठीक बैठती हों- ऐसे व्यक्ति वाक्-पटु तथा गौरवशाली होते हैं। बुद्धिमान तथा स्वार्थरहित भावना से जनसेवा करते हैं।

दांत के ऊपर एक दांत- ऐसे व्यक्ति शत्रु को परास्त करते हैं। साहसी तथा युक्तिपूर्ण होते हैं।

एक दांत दबा हुआ तथा एक उठा हुआ- किसी व्यक्ति के ऊपरी दांतों की यदि ऐसी स्थिति है तो वह संतुलित विचारों का स्थिर प्राणी होता है। दुख-सुख को समभाव से भोगता है और सदा विवेक से काम लेता है।

शिशु का दांतयुक्त जन्म लेना- शिशु का दांतयुक्त जन्म लेना माता-पिता के लिए अहितकर तथा मृत्यु का सूचक माना जाता है।

शिशु का पहले ऊपरी दांत निकलना- शिशु का पहले ऊपरी दांत निकलना नाना परिवार के लिए घातक सिद्ध होता है।

स्त्री के मध्य दांतों में छिद्र- जिस स्त्री के ऊपर के मध्य दांतों में छिद्र यानी बिरल होती है, वह वैधव्य का कष्ट भोगती है।

दांत का कटकटाना- रात को सोते समय दांतों का कटकटाना दुर्भाग्य का सूचक है।


Wednesday, May 2, 2012

कैसे हुई हंसने की शुरुआत?

कैसे हुई हंसने की शुरुआत?


हंसने का प्रारंभ कब और कैसे हुआ था? वैज्ञानिकों ने इस प्रश्न का जवाब खोज निकाला है। उनके अनुसार अब से चालीस लाख साल पहले जब व्यक्ति ने चार के बजाए दो पैरों पर चलने का प्रयास किया तो वह लड़खड़ाया और गिरा। उसके इस लड़खड़ाने एवं गिरने पर उसके साथी हंसे। यही हंसने की शुरुआत है।

इस थ्योरी के अनुसार जब वे अपने ग्रुप के किसी व्यक्ति को लड़खड़ाते हुए देखते थे, तो हंसते थे। उनका हंसना इस बात का संकेत होता था कि चलने के प्रयास में कुछ कमी है। इस थ्योरी से यह भी ज्ञात होता है कि किसी के फिसलने या लड़खड़ाने पर हम आज भी क्यों हंसते हैं एवं यह फिल्मों में स्लैपस्टिक हास्य का चिरस्थायी हिस्सा क्यों बन गया है।

प्राचीन युग में दो पैरों पर चलने का अर्थ यह होता था कि लड़खड़ाने व गिरने की आशंका अधिक थी। वास्तव में तात्पर्य यह है कि स्लैपस्टिक हास्य का विकास उसी समय से हुआ। ऐसा मैथ्यू गर्वेस का कहना है। वे अमेरिका में एवोल्यूशनरी बायोलॉजिस्ट हैं। उन्हीं के नेतृत्व में यह अध्ययन हुआ था। वे कहते हैं कि जब हम स्लैपस्टिक पर हंसते हैं, तो हम उसी चीज पर हंस रहे होते हैं, जिस पर हमारे प्रारंभिक पूर्वज हंसे थे। तभी हमें यह बात मजेदार एवं हास्य से भरी लगती है।

भाषा का विकास पहली हंसी के बीस लाख वर्ष पश्चात हुआ। इसके पश्चात ही शब्दों एवं हास्य के विभिन्न तरीकों को जोड़ा जाने लगा ताकि चुटकुले बनाए जा सकें या किसी का मजाक उड़ाया जा सके। गर्वेस एवं उनके साथी डेविड स्लोन विलसन ने अपने अध्ययन का विकास हास्य पर 100 से अधिक थ्योरियों की समीक्षा करने के पश्चात किया।

इन शोधकर्ताओं का मानना है कि हंसने से पहले व्यक्ति वैसी आवाजें निकलता था, जैसी वानर चिम्पांजी गुदगुदी किए जाने पर निकालते हैं। इन आवाजों के बारे में वैज्ञानिकों का मानना है कि यह परिवार या ग्रुप में अच्छे संबंधों को बनाए रखने हेतु निकाली जाती है।

इसके अनुसार किसी व्यक्ति को अचानक फिसलते हुए देखकर और साथ ही यह अहसास करते हुए कि इससे उस व्यक्ति को कोई चोट नहीं आएगी, आज भी हमको हंसी आ जाती है।