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Friday, February 10, 2012

इंदिरा गांधी को राजीव की खबर तेजी से लेनी पड़ती थी





वह पुरानी जींस..वे यादें

 
हाईस्कूल की पढ़ाई के बाद राजीव गांधी आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड चले गए। इधर अमिताभ ने दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज में एडमिशन ले लिया। लेकिन सरहदें इनके रिश्तों को रोक नहीं पाईं और अब ये दोनों चिट्ठी के द्वारा एक-दूसरे से जुड़े रहे। राजीव नियमित रूप से अमिताभ को पत्र लिखा करते थे। एक बार तो इंदिरा गांधी जी (तत्कालीन प्रधानमंत्री) अचानक कवि हरिवंशराय बच्चन के घर पहुंच गईं और तेजी से पूछ बैठीं ‘मेरा राजीव इंग्लैंड में मजे में तो है न! उसका कोई समाचार?’

 
तेजी ने कहा, ‘अरे वाह! अपने बेटे का समाचार आपके पास ही नहीं?’

 
‘अरे! यही तो मुसीबत है! मुझे तो अपने बेटे की खैर-खबर की जानकारी तुम्हारे बेटे से ही लेनी पड़ती है। राजीव अक्सर मुझे कोई चिट्ठी लिखे या न लिखे, लेकिन अमिताभ के लिए चिट्ठी लिखना बिल्कुल नहीं भूलता।’

 
एक बार जब राजीव इंग्लैंड से वतन वापस आए तो अमिताभ के लिए उपहार लेकर आए.. ‘अमिताभ के हाथों में पैकेट सौंपते हुए बोले, यह तुम्हारे लिए लाया हूं।’

 
इस पैकेट में एक जींस की पेंट थी। अमिताभ की जिंदगी की यह सबसे पहली जींस थी, जिसे उन्होंने वर्षो तक पहना।

 
गगनचुंबी सफर.. लेकिन दोस्ती अटूट

 
राजीव गांधी अब ‘पायलट’ बन चुके थे और अमिताभ ‘अभिनेता’। लेकिन अब भी अटूट दोस्ती के कीच कोई दूरी नहीं आई। कई बार तो अमिताभ ने उस फ्लाइट से सफर किया, जिसे राजीव गांधी उड़ा रहे थे।

 
राजीव गांधी तो अमिताभ से मिलने के लिए इतने आतुर रहा करते थे कि अक्सर वे अमिताभ को फ्लाइट की जानकारी भी दे दिया करते थे कि फलां-फलां दिन इस शहर में इस फ्लाइट में मैं पायलट रहूंगा, अगर तुम्हें कहीं आना-जाना हो इसी फ्लाइट से सफर करना।

 
इतना ही नहीं, जब भी अमिताभ, राजीव की फ्लाइट में होते और जब विमान ‘टेक ऑफ’ करता तो इस समय अमिताभ अपनी पैंसेजर सीट में बेल्ट बांधे बैठे रहते। लेकिन जैसे ही विमान आसमान में पहुंचता तो राजीव उन्हें कॉकपिट में बुला लिया करते।

 
अमिताभ को हमेशा इस बात का आश्चर्य होता कि जब भी फ्लाइट में राजीव गांधी कोई अनाउंसमेंट करते थे तो कभी भी अपना सरनेम नहीं बोला करते थे.. सिर्फ इतना ही कहते ‘आई कैप्टन राजीव’..!

 
राजीव गांधी की सादगी और सरलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कभी भी अपना परिचय देते समय वे किसी से यह नहीं कहते थे कि मैं भारत की प्रधानमंत्री का बेटा हूं।

 
इसके साथ ही राजीव ने अपनी निजी जिंदगी की कोई भी बात अमिताभ से कभी नहीं छुपाई। एक बार की की बात है जब राजीव विदेश से भारत आए तो इस बार उनके हाथ में एक फोटो एलबम था। एलबम अमिताभ के सामने खोलते हुए उन्होंने अमिताभ से पूछा..‘अमित, यह लड़की तुम्हें कैसी लगी?’

'अमिताभ के बर्थडे पर राजीव गांधी को देख चौंक गए थे लोग'




शरद ठाकर।अमिताभ बच्चन की चौथी (4) वर्षगांठ एक ऐसा यादगार लम्हा है, जिसे कभी भुलाया ही नहीं जा सकता। तेजी बच्चन इस समय तक इलाहाबाद के संभ्रांत, संस्कारी व सामाजिक माहौल में अपनी अलग ही पहचान बना चुकी थीं। मुन्ना के चौथे जन्मदिवस के अवसर पर घर में एक पार्टी रखी गई थी, जिसमें शहर के कई चुनिंदा लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी।

पार्टी की रंगत अपने चरम पर थी तभी अचानक वहां कुछ देर के लिए खामोशी पसर गई। इस महफिल में एक खूबसूरत महिला ने अपने दो वर्ष के बेटे के साथ प्रवेश किया।

इन्हें देखते ही उपस्थित सभी मेहमान एक-दूसरे के कान में फुसफुसाने लगे.. 'यह इंदिरा जी हैं'...'फिरोज खान की पत्नी'...'प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बेटी'...।

हमने तो इंदिरा जी को वृद्धावस्था में देखा, तब भी उनके जादुई व्यक्तित्व के पीछे पूरा देश पागल था। सोच सकते हैं कि युवावस्था में उनके चेहरे पर कितना नूर होगा।

इंदिराजी आगे आईं और तेजी से बोलीं.. 'लो मैं तुम्हारे छोटे से लाड़ले को ले आई हूं।' ऐसा कह, उन्होंने बेटे को आगे कर दिया... यह बच्चा कोई और नहीं, बल्कि राजीव गांधी थे। इस तरह अमिताभ और राजीव गांधी की पहली मुलाकात हुई।

दरअसल जन्मदिवस की इस पार्टी के अवसर पर यहां फैंसी ड्रेस कॉम्प्टीशन भी आयोजित किया गया था। इसलिए सभी बच्चे अलग-अलग और रंग-बिरंगी पोशाकों में सजे हुए थे। लेकिन राजीव गांधी धोती-कुर्ते में थे। घुटने से थोड़े ऊपर तक की धोती-कुर्ता और सिर पर टोपी।

जबकि अमिताभ (अमित) ने फौजियों की ड्रेस पहन रखी थी। चार वर्षीय अमित ने दो वर्षीय राजीव का प्रेमपूर्वक अभिनंदन किया। अपना दायां हाथ राजीव के बाएं हाथ में डाले हुए घूमते रहे। लेकिन कार्यक्रम के मुश्किल से आधे घंटे ही बीते होंगे कि राजीव गांधी की धोती खुल गई। राजीव इतने छोटे थे कि वे अपने कपड़े तो संभाल नहीं सकते थे। इंदिराजी ने तुरंत उनके कपड़े बदल दिए और चूड़ीदार पायजामा, खादी का कुर्ता और टोपी पहना दी। अब राजीव बिलकुल राजनेता दिखने लगे।

हम भारतीयों ने तो दशकों बाद राजीव गांधी को राजनेता की पोशाक में देखा लेकिन अमिताभ ने उन्हें 4 वर्ष की उम्र में ही इस पोशाक में देख लिया था।

दोनों के बीच गहरी मित्रता थी। एक बार अमिताभ ने राजीव से कहा भी कि तू इसी गेटअप में जंचता है। देखना एक दिन तू जरूर राजनेता बनेगा।

लेकिन उस समय राजीव को राजनेता बनना पसंद नहीं था। किशोरावस्था से ही उनकी रुचि उपकरणों और इलेक्ट्रिक चीजों में ज्यादा रही। रेडियो, टेपरिकॉर्डर, चाभी से चलने वाले खिलौने, बैटरी से उडऩे वाले विमान जैसे खिलौनों में राजीव गांधी की इतनी रुचि थी कि वे अक्सर इन्हें खोल दिया करते थे और इंजीनियर की तरह उसके पुर्जों की जांच-परख में लग जाया करते थे।

काश, विधाता ने उन्हें विमान की कॉकपिट से उठाकर प्रधानमंत्री के सिंहासन पर न बिठाया होता।

घर था इधर-उधर
इलाहाबाद में कवि बच्चनजी के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे खुद के लिए एक मकान खरीद सकते। वे अधिकतर समय किराए के मकानों में ही रहे। इसके अलावा उनकी कुंडली में स्थिरता का योग तो जैसे था ही नहीं। निश्चित समयांतर पर उन्हें कई मकान बदलने पड़े।

बैंक रोड, स्ट्रैची रोड, एडल्फी हाउस और इसके बाद क्लाइव रोड स्थित मकान... इलाहाबाद के ये तमाम पुराने मकान आज अमिताभ के चाहने वालों के लिए तीर्थधाम बन चुके हैं। लेकिन उस समय इन सभी घरों में कवि की गरीबी और तेजी के आंसू ही बसा करते थे।

अमितजी के शैशवकाल की अनेक यादें इन मकानों से जुड़ी हुई हैं...

एडल्फी हाउस की बात करें तो यहीं पर अमिताभ की मुलाकात राजीव गांधी से हुई थी और इसी घर में ही अमिताभ के छोटे भाई अजिताभ का जन्म हुआ था। इसके डेढ़-दो महीनों बाद ही भारत अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हुआ था। अमिताभ ने स्कूल जाने की शुरुआत भी यहीं से ही की।

इसी मकान से एक और कड़वी याद जुड़ी हुई है... एक बार शाम के समय कवि हरिवंशराय बच्चन घर आते ही रो पड़े.. तेजी ने उनसे पूछा कि क्या बात है... कवि ने जवाब दिया... 'महात्मा गांधी की हत्या हो गई। हम अनाथ हो गए'।

इधर, बैंक रोड स्थित मकान में जब बच्चन परिवार रहा करता था.. तब अमिताभ को एक बार बहुत तेज बुखार आया था। और उनके स्वस्थ होने के लिए कवि ने प्रतिज्ञा की थी कि उनका बेटा स्वस्थ हो जाए... वे जीवन में कभी भी शराब को हाथ तक नहीं लगाएंगे।

स्ट्रैची रोड स्थित मकान में अमिताभ की वयोवृद्ध दादी मां सुरसती का देहांत हुआ था। इसी समय अमित ने पिता बच्चन से पूछा था ... 'दादी कहां गई?'.. तो बच्चन ने कहा... 'भगवान के पास...'

हालांकि यह सस्ता जमाना था। किराए से मकान आसानी से और कहीं भी मिल जाया करते थे। लेकिन तेजी जब पिताजी के घर थीं तो उनका जीवन शानो-शौकत वाला था। इसलिए उन्हें हमेशा बड़े मकान ही पसंद आया करते थे।

40 के दशक में जब इलाहाबाद में सामान्य मकान का किराया 5 या 7 रुपए हुआ करता था, तब भी बच्चनजी 30-35 रुपए तक किराए के मकान के लिए प्रतिमाह खर्च किया करते थे। मकान को सजाने-संवारने की पूरी जिम्मेदारी तेजी की थी।

कवि तो अधिकतर समय नौकरी और कविताओं के सृजन में या कार्यक्रमों के चलते घर से बाहर ही रहा करते थे। कभी-कभी इनके रहन-सहन को देखकर मकान मालिक भी बेजा फायदा उठाने से नहीं चूकते थे। बच्चन परिवार को पता ही नहीं चलता था और मकान का किराया बढ़ जाया करता था। 30 रुपए किराया रातों-रात 50 रुपए भी हो जाया करता था। जहां तक हो सके वहां तक तेजी मकान मालिकों को सहयोग ही किया करती थीं। बहस या दादागिरी जैसे शब्द तो उनकी जिदंगी की डिक्शनरी में जैसे थे ही नहीं।

इसी तरह बैंक रोड स्थित एक मकान का वाकया है.. यहां मकान मालिक ने अचानक ही मकान का किराया 50 रुपए से बढ़ाकर 75 रुपए कर दिया। कवि इस समय घर पर नहीं थे, किसी काम से दूसरे शहर गए हुए थे। तेजी ने सोचा, यह बात उन्हें बतानी ठीक नहीं.. वे इसे लेकर ङ्क्षचतित हो उठेंगे।

तेजी ने खुद ही दूसरा मकान ढूंढऩा शुरू कर दिया और स्ट्रैची रोड स्थित एक सुंदर और बड़ा बंगला मिल गया। इसकी कीमत भी कम थी। तेजी ने रातों-रात बैंक रोड का यह मकान खाली कर दिया और समान बटोर यहां शिफ्ट हो गईं।

कवि को तो यह बात उनके वापस आने पर ही मालूम हुई। लेकिन वे तेजी की हिम्मत और सूझ-बूझ देख दंग रह गए।

... कुछ ऐसा ही ऐडल्फी हाउस में भी हुआ। इस मकान मालिक ने अचानक ही उन्हे मकान खाली करने का फरमान सुना दिया। कवि चाहते तो मकान मालिक के खिलाफ अदालत भी जा सकते थे, लेकिन वे सीधे-सादे और नम्र स्वभाव के व्यक्ति थे, वे इस तरह का कोई कदम उठाने के पक्ष में नहीं थे।

अमिताभ के मन पर ये बातें गहरा प्रहार किया करती थीं। काल चक्र घूमता रहा... तकदीर ने करवट ली और अब अमिताभ के नाम का सिक्का चलने लगा था। उन्होंने इलाहाबाद जाकर इन मकानों (जहां वे रह चुके थे) की खोजबीन शुरू कर दी।

दोस्तों ने जानकारी दी... 'वह मकान तो अब जर्जर अवस्था में पहुंच गया है, देखने में भी बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।'

दोस्तों की इस बात पर अमिताभ ने उस समय कुछ नहीं कहा, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने कई मकान खरीद लिए। मकान बेचने वाले भी अब तक यह बात जान चुके थे कि अमिताभ ये मकान क्यों खरीद रहे हैं। अमिताभ जैसे महारथी जब ये मकान खरीद रहे थे तो मकान मालिक भी उनसे क्या ज्यादा कीमत वसूलते? फिर भी अमिताभ ने बिना तोल-भाव के वे मकान खरीद लिए, जहां कभी उनकी पिता की गरीबी और मां के आंसू टपकते थे।

दोस्तों-परिचितों-सगे संबंधियों को जब यह बात मालूम हुई तो सभी ने अमिताभ से कहा कि 'तुम्हें व्यापार करना नहीं आता, अगर तुमने मोल-भाव किया होता तो यही मकान कम कीमत में भी मिल जाते..!'

इसका अमिताभ ने क्या जवाब दिया होगा...? हम अंदाजा लगाते हैं तो इसके जवाब के लिए फिल्म 'दीवार' का यह दृश्य और संवाद बिल्कुल सटीक बैठता है... फिल्म के दृश्य में एक इमारत के लिए बाजार भाव से भी अधिक कीमत चुकाने की बात पर अमिताभ और मकान मालिक के बीच संवाद होता है...

मालिक कहता है... 'आपको सौदा करना नहीं आता, अगर आपने थोड़ी भी खींचतान की होती तो यह मकान आपको सस्ते में भी मिल सकता था...!'

अमिताभ जवाब में कहते हैं... 'माफ करना, बिजनेस करना तो आपको नहीं आता!अगर आप इस बिल्डिंग के लिए और भी कीमत मांगते तो वह भी आपको मिल जाती...!'

मकान मालिक आश्चर्यचकित मुद्रा में अमिताभ से पूछता है... 'ऐसी कौन सी खास बात है इसमें...'

अमिताभ जवाब देते हैं... 'यह बिल्डिंग जब बन रही थी, तब मेरी मां ने यहां ईंटें उठाई थीं...!'

'हम जहां खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है'





शरद ठाकर। आईए, इस ऐतिहासिक घटना का हिस्सा बनिए। गुजरात के साहित्य इतिहास में एक और नवलकथा लिखी जा रही है और इसके कथाकार हैं गुजरात के जाने-माने लेखक डॉ. शरद ठाकर। बच्चन युग से चले आ रहे भारतीय सिनेमा जगत के इस ऐतिहासिक सफर में हम आपको भी हमसफर बनाने जा रहे हैं। आपके पास भी ऐसी कोई कहानी है तो उसे हमें भेज दें। अगर आपकी कहानी पसंद आएगी तो उसे भी अमिताभ बच्चन पर प्रकाशित होने वाली इस पुस्तक का अहम हिस्सा बनाया जाएगा...।

प्रिय पाठक मित्रो, अगर आप गुजराती हैं तो शायद आपने मेरा नाम सुना होगा। पिछले 18 वर्षों से मैं 'डॉक्टर की डायरी' तथा 'रण में खिला गुलाब' नामक व्यंग्य लिखता आ रहा हूं। अब तक मेरी 30 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। मेरे लेखों और किताबों को लेकर आपकी ओर से मुझे जो प्रतिसाद मिला, उसके लिए मैं आपका ऋणी हूं।

लिखने का मेरा सफर निरंतर जारी है और मैं एक बार फिर से एक नया शब्द-साहस करने जा रहा हूं। इस बार मैं हिंदी फिल्म जगत के महानायक अमिताभ बच्चन पर लिखने जा रहा हूं। मैं जानता हूं कि अमित जी को जितना मैं पसंद करता हूं, उतना ही आप भी उन्हें पसंद करते हैं। मुझे विश्वास है कि इस महानायक के जीवन सफर में हमसफर बनकर आपको भी बहुत मजा आएगा। आपका, डॉ. शरद ठाकर

डॉक्टर की डायरी के पन्ने:
अमिताभ बच्चन एपिसोड-1 'हम जहां खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है' बात 1971 की है जब मेरी उम्र 16 वर्ष के आसपास थी। एस.एससी बोर्ड की फाइनल परीक्षा हो चुकी थी और दो-ढाई महीने का लंबी छुट्टियां थीं। परीक्षा में मैं हमेशा ही प्रथम श्रेणी में पास हुआ करता था। पिताजी शिक्षक और पढ़ाई के मामले में बहुत सख्त थे। उस समय घर में रेडियो बजाने तक की मनाही थी और फिल्में देखना तो घोर पाप जैसा था। इस तरह हमारे घर का सिनेमा जगत से लगभग दूर तक कोई रिश्ता नहीं था और तब मैं किसी अभिनेता या अभिनेत्री का नाम तक नहीं जानता था।

लेकिन यह मुझे अच्छी तरह याद है कि उस समय एक सिनेमाई सितारे का नाम प्राणवायु की तरह चारों ओर छाया हुआ था और वह नाम था- राजेश खन्ना। किसी भी शहर में चले जाइए, उनकी एक-दो फिल्में तो किसी न किसी सिनेमाघर में लगी ही होती थीं। उनकी हेयर स्टाइल, उन पर फिल्माए गए गीत, संवाद, उनके कपड़े पहनने के तरीके मसलन उनकी हर एक अदा और हर एक चीज एक फैशन बन चुकी थी। राजेश खन्ना की इतनी प्रसिद्धि को लेकर मेरा भी मन हुआ कि उनकी कोई फिल्म देखी जाए, लेकिन पिताजी से यह कहने की मुझमें हिम्मत नहीं थी कि - मुझे फिल्म देखनी है।

एक बार मैं शीत ऋतु में अहमदाबाद आया हुआ था। लाल रंग की सिटी बस में बैठा खिड़की से आंखे फाड़-फाड़कर अहमदाबाद की चकाचौंध निहार रहा था कि उसी समय मुझे फिल्म 'आनंद' का पोस्टर दिखाई दिया। पोस्टर में राजेश खन्ना का मुस्कुराता हुआ चेहरा और उनका नाम लिखा हुआ था। पोस्टर पर मुख्य कलाकारों के नामों की भी सूची थी, जिसमें एक और अनजाना सा नाम भी था- अमिताभ बच्चन।

मैंने कलाकारों के नाम पढ़े ही थे कि तभी बस चल दी, लेकिन जाते-जाते मैंने इस नाम को भी याद करने की कोशिश की। पहली बार में नाम कुछ कठिन सा भी प्रतीत हुआ और मैंने मन ही मन कहा कि कितना कठिन नाम रखा है। फिल्मी दुनिया में तो कम से कम नाम इतने सरल होने चाहिए कि एक झटके में ही याद हो जाएं।

उन दो महीनों में मैंने कई लोगों से सिर्फ एक ही नाम सुना 'राजेश खन्ना'। जब भी फिल्मों की बातें होती तो कोई न कोई यह कह ही देता कि 'आनंद' फिल्म देखी तुमने? इस फिल्म की चारों ओर इतनी चर्चा थी कि यह बात पिताजी के कानों तक भी पहुंच गई। अंतत: हाईकमान की ओर से हरी झंडी मिली कि अगर फिल्म साफ-सुथरी होगी तो बच्चों को भी दिखाई जाएगी।

इसके बाद जूनागढ़ की जयश्री टॉकीज में मैंने यह फिल्म (आनंद) देखी। फिल्म देखने के बाद मैंने भी यह स्वीकार कर लिया था कि यह फिल्म राजेश खन्ना की ही थी। फिल्मी पर्दे पर तो उस समय जैसे राजेश खन्ना ने कोई जादू कर रखा था। दूसरे दिन मेरी भी दोस्तों से इस फिल्म को लेकर बातें हुईं तो उनसे मैंने अपने मन की भी बात कह ही दी -फिल्म में डॉ. भास्कर...अरे जिसे राजेश खन्ना बाबू मोशाय कहकर बुलाते हैं ... वह भी जबर्दस्त कलाकार है यार! उसकी आवाज में इतनी कशिश है कि बार-बार सुनने को दिल करता है और उसकी आंखें! उफ्फ...!

सचमुच मुझे तो यह नायक पहली बार में ही जंच गया था। लंबा-दुबला और अलग ही तरह की हेयर स्टाइल। न उसके चलने का ढंग अच्छा था न ही खड़े होने का। न जाने संवाद बोलते समय वह अपने लंबे-लंबे हाथ क्यों हिलाता है, यह बात कुछ समझ ही नहीं आती थी। फिर भी उसकी अदाएं मेरे मन को छू गईं थीं।

'आनंद' फिल्म के तीन दृश्य तो मेरे मन-मस्तिष्क पर पूरी तरह छा गए थे...। झोपड़-पट्टी में गरीब मरीजों के बीच की देखरेख करता डॉ. भास्कर....बोल उठता है: आज आनंद बात करते-करते हांफने लगा। मौत की पहली निशानी सामने आ गई।

और फिल्म का अंतिम दृश्य था: आनंद की मृतदेह को पकड़कर रोता, चिल्लाता अमिताभ। इन्हीं दृश्यों को याद कर-कर के मैंने अपने दोस्तों से कहा- इस बंदे में दम लगता है। मैंने उसी समय मान लिया था कि भले ही 'आनंद' फिल्म राजेश खन्ना की फिल्म थी, लेकिन मुझे तो यह 'बाबू मोशाय' भी कम नहीं लगा।

दोस्तों ने यह बात सुनते ही मुझे चुप करा दिया और कहा - खबरदार! अब अगर काका (राजेश खन्ना) के बारे में एक शब्द भी बोला तो। एक दोस्त ने तो यहां तक कहा - तुझे मालूम है पूरी फिल्म इंडस्ट्रीज में एक कहावत है - ऊपर 'आका' और नीचे 'काका'! फिल्म में काका के रहते तू किसी और की तारीफ कर रहा है। जस्ट शट-अप!

उस समय मैं चुप हो गया, क्योंकि यह बात सही भी थी। लेकिन विधाता नाम के जादूगर के हाथ तो लगातार दोनों कामों (नया लिखने और पुराना मिटाने) में व्यस्त रहते हैं और वे निरंतर नया लिखते और पुराना मिटाते जाते हैं। मतलब इसी को कहते हैं- समय का चक्र।

ठीक चार वर्ष बाद ऐसा ही कुछ हुआ। अब हिंदुस्तानी फिल्म इंडस्ट्रीज में एक नई कहावत जन्म ले चुकी थी : ऊपर 'आभ' और नीचे 'अमिताभ'! इस समय तक मेरा जीवन चक्र भी एक नए परिवर्तन की दिशा में घूम चुका था। मैं जूनागढ़ जिले के तीनों केंद्रों में एसएससी की परीक्षा में प्रथम आया और पूरे सौराष्ट्र में दूसरे क्रमांक पर। इसके बाद मैंने साइंस कॉलेज में प्रथम वर्ष पूर्ण किया और जामनगर के मेडिकल कॉलेज से जुड़ गया। इस उम्र में पहुंचने तक अब पिताजी ने भी अपना नियंत्रण मुझ पर से पूरी तरह हटा लिया था। अपनी मर्जी का मालिक बनते ही मैंने सबसे पहले एक ही काम किया - फिल्में देखने का।

दिन भर की भागदौड़, रात-रात का जागरण लेकिन इस पर भी फिल्म के लिए तीन घंटे का समय तो निकाल ही लिया करता था। साढ़े चार वर्ष के दौरान मैंने राजकपूर, देव आनंद, मनोज कुमार, शशि कपूर, शम्मी कपूर, धर्मेंद और अमिताभ की अनेकों फिल्में देख डाली थीं।

हिंदी फिल्म इतिहास के उन सुनहरे वर्षों के लगभग तमाम अभिनेता-अभिनेत्रियों, गायक-गायिकाओं, गीतकारों, फिल्मकारों, संगीतकारों की छोटी-छोटी बातों की भी मुझे जानकारी है तो वह कॉलेज के उन्हीं चार वर्षों की वजह से। उन वर्षों में फिल्मी दुनिया से मेरे लगाव का ही यह परिणाम है कि पिछले पंद्रह वर्षों से मैं लगातार एक म्युजिकल क्लब का संचालन करता आ रहा हूं।

मुझे लगभग सभी कलाकार पसंद हैं - मधुबाला, नरगिस, नूतन और वहीदा जैसी अभिनेत्रियां आज भी मेरे सांसों की सुगंध की तरह हैं तो राज-दिलीप-देव मेरे लिए ब्रह्मा-विष्णु-महेश त्रिदेव की जोड़ी की तरह। साहिर लुधियानवी को पसंद करने की मेरी हद नहीं और मोहम्मद रफी साहब, तलत साहब और हेमंत कुमार की तारीफ के लिए मेरे पास शब्द नहीं।

यह सूची लंबी और शाश्वत है। अगर मेरे लिए संभव हो पाया तो मैं इन सबके बारे में एक-एक किताब जरूर लिखूंगा। लेकिन फिलहाल तो मेरी हालत 'तंग दामन, वक्त कम और गुल बेशुमार' शेर की पंक्तियों जैसी ही है।

मसलन, लिखने के लिए मेरे सामने कई प्रख्यात नाम थे। गम में डूबे दिलीप कुमार थे तो रम में डूबे सहगल साहब। संगीत के भीष्म पितामह अनिल विश्वास थे तो मखमल के मालिक तलत साहब। यह लाइन लंबी थी लेकिन फिर भी शांत और शिस्तबद्ध थी। लेकिन इनमें से एक कलाकार, आसमान की तरह ऊंचा और सागर की तरह गहरा। मेरी नजरों के सामने इस तरह खड़ा था, जो अपनी जगह से टस से मस ही नहीं होना चाहता था। अंतत: वह सभी फिल्मी कलाकारों के नामों की लाइन तोड़कर मेरे सामने आ गया। मैंने उसे लाख समझाया वही नहीं माना। अंत में मैंने कहा : कृपया प्रतीक्षा कीजिए, आप अभी लाइन में हैं!

और उसी समय मुझे एक गरजती हुई आवाज में जवाब मिला - अपुन जिधर खड़ा रह जाता है, लाइन वहीं से शुरू होती है!

मित्रो, फिल्म 'कालिया' का यह संवाद अमिताभ द्वारा फिल्म के एक दृश्य में खलनायक को दिया गया जवाब नहीं था, बल्कि यह तो 1913 से शुरू हुई बोलती फिल्मों से लेकर आज तक के अभिनेताओं के लिए दिया गया जवाब है। इसीलिए तो आज अमित जी जहां भी खड़े होते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है।

फिल्म 'सात हिंदुस्तानी' की नगण्य सफलता को नजरअंदाज करें तो हिंदी सिनेमा के इतिहास में बाबू मोशाय का जन्म हुआ था 1971 में आई फिल्म 'आनंद' से। अगर उनकी 6 फिट लंबी काया में समाए हुए आसमान की तरह ऊंचे व्यक्तित्व की बात करें तो उनका जन्म हुआ था-

तारीख 11.10.1942 के दिन कटरा शहर में डॉ. ब्रॉर के नर्सिंग होम में। इस दिन श्रीमती तेजी हरिवंशराय बच्चन नाम की महिला ने एक बालक को जन्म दिया। नॉर्मल डिलीवरी थी। बालक का वजन साढ़ आठ पौंड और शरीर की लंबाई थी 52 सेंटीमीटर।

नवजात शिशु को माता की गोद में सौंपते समय डॉ. ब्रार बोली- बच्चे की लंबाई बहुत अच्छी है। लगता है बड़ा होकर बहुत ऊंचा होगा।
'बड़ा होकर सिर्फ ऊंचा ही नहीं बल्कि महान भी होगा!' मुझे लगता है यह वाक्य विधाता ने कहा होगा, लेकिन उस समय यह वाक्य कोई सुन न सका।

जब 'बिग-बी' को नौकरी के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ीं...!




शरद ठाकर।अच्छा ही हुआ कि सरकारी अधिकारियों की वजह से अमितजी को आकाशवाणी में नौकरी नहीं मिली। नहीं तो हमें आज देश भर में प्रसारित हो रहे सीरियल 'कौन बनेगा करोड़पति' में बिग बी की यह आवाज नहीं सुनने मिलती...नमस्कार देवीयों और सज्जनों, मैं अमिताभ बच्चन 'कौन बनेगा करोड़पति' में आपका स्वागत करता हूं...!

आखिरकार एक दिन कवि बच्चन ने अमिताभ से कहा, 'मुझे लगता है तुम्हें कोलकाता जाना चाहिए। वहां मेरा एक दोस्त रहता है, जिसका नाम मिस्टर गजानंद है। साथ ही कवि का कहना था कि कोलकाता शहर किसी को निराश नहीं करता।'

अमितजी कोलकाता में गजानंद अंकल के घर पहुंच गए। नौकरी के लिए उन्होंने यहां एक-एक दिन में 15-15 तक आवेदन किए। इसके अलावा अमिताभ खाली समय में फुटबाल मैच देखने से भी नहीं चूकते थे। अगर टिकट खरीदने के पैसे नहीं होते थे तो वे दीवार पर चढ़कर मैच देखा करते थे। मोहन बागान उनकी प्रिय टीम थी। अपने पसंदीदा खिलाडिय़ों को देखने के लिए अमितजी किराए की दूरबीन भी ले आया करते थे।

आज भी उनका फुटबाल के प्रति लगावा बिल्कुल कम नहीं हुआ है। हम जितनी एकाग्रता के साथ अमिताभ की फिल्में देखा करते हैं उससे कहीं ज्यादा रुचि से वे फुटबाल का मैच देखा करते हैं। दुनिया में कहीं भी दो अच्छी टीमों के बीच फुटबाल का खेल हो रहा हो, अमितजी लाइव नहीं देख पाएं तो तो उसकी सीडी या डीवीडी तक मंगा लेते हैं। आज कोलकाता छूट गया, खिलाड़ी बदल गए, फिर भी अमितजी मोहन बागान के जबर्दस्त फैन हैं।

एक दिन 'बर्ड एंड हिल्जर्स' नामक कंपनी की ओर से उन्हें इंटरव्यू के लिए बुलावा आया। इंटरव्यू में अमिताभ पास हो गए। कुछ दिनों में ही उन्हें नियुक्ति पत्र मिल गया। पोस्टमैन जब यह पत्र लेकर आया तो गजानंद अंकल घर में उपस्थित नहीं थे। पोस्टमैन ने नियुक्ति पत्र सीधा अमितजी के हाथों में थमा दिया। अमिताभ की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने तुरंत ही दिल्ली फोन कर पिताजी को यह शुभ समाचार सुनाया। अंत में पूछा! बाबूजी, मैं क्या करूं, यह नौकरी ले लूं? बाबूजी ने जवाब दिया... बेटा, यह तुम्हारे जीवन की पहली नौकरी है, इसे स्वीकार कर लो और जीवन में एक बात हमेशा याद रखना कि यह नौकरी तुम्हें तुम्हारी योग्यता के कारण मिली है, किसी की सिफारिश से नहीं।

यह 1993 जुलाई का महीना था। कोलसा विभाग में काम करना था। नियत तनख्वाह 500 रुपए मासिक थी। इसमें से कटौती के बाद अमित के हाथ में 470 रुपए आया करते थे। ट्रेनिंग के लिए अमितजी को आसनसोल, धनबाद और हजारीबाग की खदानों में जाना था।

इसी तरह की ट्रेनिंग के दौरान एक बार वे एक दुर्घटना के शिकार हो गए। अमितजी कोलसा की खदान में जब टे्रनिंग ले रहे थे, तभी एक चट्टान धसक गई और वे खदान के अंदर फंस गए। दूसरी तरफ पानी भी तेज प्रवाह से खदान में भरने लगा। जिंदगी का अंत बहुत नजदीक दिखाई दे रहा था, तभी एक बचाव दल ने उन्हें बचा लिया। इसी घटना को वर्षांे बाद फिल्म 'कालिया' के एक दृश्य में भी फिल्माया गया।

जिस दिन अमित के हाथों में पहली तनख्वाह आई, उनकी खुशी का कोई ठिकाना ही नहीं था। उन्होंने अपनी इस पहली तनख्वाह में से बाबूजी के लिए पेन, मां के लिए साड़ी और छोटे भाई बंटी (अजिताभ) के लिए शर्ट खरीदी थी। परिजनों के अलावा अमिताभ गजानंद अंकल के लिए भी गिफ्ट लेना नहीं भूले थे।

अमिताभ ने जब अपनी पहली तनख्वाह से परिवार के लिए उपहार खरीदे, यह उनकी जिंदगी की पहली और आखिरी घटना थी। 470 की रकम उस जमाने में काफी हुआ करती थी। अमितजी कोलकाता में पांच वर्ष रहे और कुल दो जगह ही नौकरी की। उनकी आखिरी तनख्वाह 1640 रुपए थी। इतनी तनख्वाह में एक परिवार सुख-चैन की जिंदगी गुजार सकता था। लेकिन अमितजी के हाथ खर्चीले हो गए थे। वह अपनी पूरी तनख्वाह मौज-मस्ती में ही उड़ा दिया करते। महंगे कपड़े, ब्रांडेड घडिय़ां, टाई, जूते के अलावा अलग-अलग तरह की कफलिंग्स का भी उन्हें काफी शौक था। अब जिस व्यक्ति के ऐसे शौक हों तो वह परिवार के लिए पैसे बचा भी कैसे सकता है?

इसके उलट हर दो-चार महीने में बाबूजी को दिल्ली से बेटे के लिए मनीऑर्डर करना पड़ता था। अब प्रश्न यह उठता है कि अतिम आखिर इतने सारे पैसे कहां उड़ा दिया करते थे? इसका रहस्य बहुत रोमांचक है...जिसकी कहानी आगामी अंक में बताएंगे।

कोलकाता में अमिताभ ने कुल 5 वर्ष का समय बिताया। 1963 से 1968 के बीच उन्होंने मात्र दो जगह ही नौकरियां की। लेकिन उनके पैरों में स्थिरता नहीं थी। मकानों की पसंद को लेकर वे हमेशा कन्फ्यूज रहे। इन पांच वर्षों में उन्हें कुल बीस मकान बदले। एक बार दिल्ली आकर वे अपनी ढोलक ले गए। बाबूजी को यह बात बहुत अजीब लगी कि आखिर खदान में काम करने वाले मेरे बेटे को ढोलक की जरूरत क्यों आन पड़ी?

उन्हें क्या पता था कि नौकरी के बाद उनके लाड़ले की मित्रमंडली के साथ शानदार पार्टी हुआ करती थी। प्रतिदिन शाम को सिगरेट के धुंए और व्हिस्की की आग के बीच ढोलक पर थाप मारते हुए भोजपुरी जुबान में उत्तरप्रदेश का एक लोकगीत गाया करते थे। जिस गीत को सुनकर बंगाल की सश्यश्यामला युवतियां उन पर फिदा हो जाया करती थीं और भविष्य में इसी गीत पर पूरा देश झूमने वाला था... अमितजी का यह गीत था... मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है...

Amitabh Bachchan Story in Doctor Diary




शरद ठाकर,अहमदाबाद।फिल्म का नाम याद नहीं लेकिन इस फिल्म का एक डॉयलॉग शब्दश: याद है, जिसमें फिल्म के नायक अमिताभ बच्चन बोलते हैं 'पैसे आते नहीं, पैसे पैदा किए जाते हैं।' इस जालिम जमाने में पैसे उगाहने के तरीकों में मैं पड़ना नहीं चाहता। लेकिन बच्चन साहब की रौबदार और दादागिरी भरे अंदाज में बोले गए ये शब्द मुझे बहुत पंसद हैं।

1973-74 में देखी फिल्म 'दीवार' का एक दृश्य भी मुझे छू गया था। इस फिल्म में स्मगलर इफ्तेखार जब अमिताभ के काम से खुश होकर अपना ऑफिस उनके हवाले कर देते हैं, तब अमित एक पल के लिए ऊंची इमारत के कांच से बाहर सड़क पर नजर दौड़ाते हैं और उनकी आंखों के सामने उनके दुखद अतीत के दृश्य आ जाते हैं। उनकी गरीब मां कपड़ों की पोटली और दो बच्चों के साथ मुंबई की सड़कों पर भिखारी की तरह भटक रही है और बड़े बेटे के हाथ पर लिखा हुआ है : 'मेरा बाप चोर है।'

ये क्षण अमित के मन में चल रहे द्वंद्व के क्षण हैं। कहते हैं गलत रास्ते पर जाने से पहले मनुष्य का उसकी अंतरात्मा एक बार संवाद जरूर होता है। अमित पहला दृश्य याद कर स्मगलर का यह मुख्य ओहदा स्वीकारने के लिए तैयार हो जाते हैं।

इफ्तेखार तो वहां से चला जाता है, लेकिन इसके बाद अमित गद्दीदार रिवॉल्विंग चेयर पर बैठकर अदाओं के साथ देबल पर अपने पैर फैला लेते हैं और उनकी इस हरकत से अनेक संदर्भ अपने आप प्रकट हो जाते हैं। जब मैंने यह फिल्म (दीवार) देखी, तब मेरी उम्र 19 वर्ष थी। मैं तब फर्स्ट एम.बी.बी.एस में था। लेकिन इस फिल्म में अमिताभ का अभिनय और बोले गए उनके एक-एक शब्द और संवाद ने मुझ पर इतना असर किया कि लगातार तीन दिन तक मैंने यह फिल्म दो-दो बार देखी थी, जबकि वार्षिक परीक्षा मेरे सिर पर थी।

सलीम-जावेद की जोड़ी ने कितने जोशीले संवाद लिखे थे कि लंबे, दुबले-पतले अमिताभ और उनकी नई तरह की हेयर स्टाइल के कारण वे इतने हैंडसम, स्मार्ट और डायनैमिक लगते थे कि आज तक उनके सामने बड़े-बड़े सुपर स्टार बगले झांकते हुए नजर आते हैं। अमिताभ को यह नया हेयर लुक हबीब नामक हेयर-आर्टिस्ट ने दिया था, जो फिल्म 'जंजीर' में पहली बार दिखाई दिया।

फिलहाल हम बात कर रहे थे - 'बहुत कम मेहनत' और 'बहुत कम समय' में 'बहुत से पैसा' कमाने की। अमिताभ का यह फिल्मी डॉयलॉग उनकी व्यक्तिगत जिंदगी से भी जुड़ा हुआ है। दरअसल अमिताभ का बचपन सीमित ऐशो-आराम में ही व्यतीत हुआ है। पिता हरिवंशराय बच्चन इलाहाबाद में अध्यापक थे तो सीधी सी बात है कि पगार भी सीमित थी।

माता तेजी बच्चन एक उच्च स्तर की लाइफ स्टाइल में जीने वाली महिला थीं। उनकी सोच अलग ही तरीके के थी। घर भले ही किराए का हो, लेकिन होना बड़े आकार का चाहिए। कपड़े भले ही कम हों, लेकिन अच्छी क्वालिटी के होने चाहिए। घर में तीज-त्यौहारों-पार्टियों का बोलबाला था। इसके अलावा घर की सजावट, रंगों की पसंद, और साथ ही उन्हें फोटोग्राफी और बागवानी का भी बहुत शौक था। कवि पिता कितना भी कमाएं लेकिन इन खर्चों के आगे तो बहुत थोड़े ही थे।

इन परिस्थितियों में ही अमिताभ की जिंदगी से दो प्रसंग जुड़ते हैं कि उस समय नन्हा अमिताभ क्या सोचता होगा। उसके दिल में अधिक से अधिक पैसा कमाने की कामना कब जन्मी होगी या नहीं?

ये हैं वे प्रसंग-
पहला प्रसंग इलाहाबाद का ही है। तेजी दोनों बच्चों के साथ मुश्किलों से घर का खर्च चला रही थीं क्योंकि पति विलायत में रहकर पीएचडी कर रहे थे। विलायत में पढ़ाई का निर्धारित समय पूरा हो चुका था, तभी कवि ने विचार किया कि इलाहाबाद वापस जाकर पीएचडी करने की बजाय विलायत में ही कुछ महीने और रहकर पीएचडी कर ली जाए। इसलिए अब उनका खर्च पहले की तुलना में बढ़ गया था।

इधर तेजी को आर्थिक तंगी की वजह से अपना घर तक बेचना पड़ गया। तेजी से बच्चों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दैनंदिन खर्चों पर भी बड़े पैमाने पर कटौती कर दी और अपने सारे शौक व इच्छाओं को दरकिनार कर दिया। इधर विलायत में कवि को तो इस बारे में कुछ भी पता नहीं था। जब उनका भारत वापसी का समय आया तो उन्होंने तेजी को पत्र द्वारा अपने आने की खबर की और कहा कि वह बच्चों के साथ उन्हें रिसीव करने बंदरगाह पर आए तो उन्हें बहुत अच्छा लगेगा।

लेकिन तेजी ने जवाब में कहा कि आपको लेने के लिए मैं बंदरगाह तक नहीं आ सकती। कवि मुंबई उतरकर ट्रेन से इलाहाबाद पहुंचे। घर पहुंचकर पत्नी और बच्चों से मुलाकात की। पिता खिलौनों में अमित के लिए विलायत से एयरगन लाए थे तो छोटे बंटी के लिए पांच डिब्बों वाली चाभी भरने वाली ट्रेन लाए थे। दोनों बच्चों इन खिलौनों से बहुत खुश हो गए।

रात के खाने के बाद सब सोने चले गए। बंटी तो इस समय तक सो चुका था, लेकिन अमित को अभी तक नींद नहीं आई थी और उसके कान माता-पिता की बातों पर लगे हुए थे।

कवि बच्चन ने तेजी से कहा, 'तुमने पत्र में लिखा था कि तुम मुझे रिसीव करने बंदरगाह पर नहीं आ सकती, लेकिन फिर भी मुझे आशा थी कि तुम आओगी। जब मैं स्टीमर से उतरा तो मेरी आंखें तुम्हें ही ढूंढ़ रही थीं। तुम वहां पर क्यों नहीं आईं?'

जवाब देते समय तेजी रो पड़ीं और कहा 'तुम्हें पता है कि घर की आर्थिक स्थिति कैसी हो चुकी है? आज रात में हमने जो खाना खाया, वह बासा खाना था। घर में अनाज का एक दाना भी नहीं बचा है। तुम्हें रिसीव करने के लिए इलाहाबाद से मुंबई तक जाने का किराया कहां से लाती?' तेजी के ये शब्द सुनकर कवि स्तब्ध रह गए और विलायत से पीएचडी लाने की जो खुशी थी, वह एक ही पल में छिन्न-भिन्न सी हो गई, माथे पर शिकन उभर आई और उन्होंने अब कसमसाती हुई आवाज में कहा, घर की ऐसी हालत हो गई और तुमने मुझे अंधेरे में रखा। अगर तुमने मुझे पहले बता दिया होता तो मैं अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर सीधा यहां चला आता।

इधर दूसरी तरफ माता-पिता की ये बातें सुन-सुनकर अमित गुस्से की आग में जल रहा था लेकिन वह रो नहीं पा रहा था। उसके दिमाग में इस दुनिया के खिलाफ गुस्सा था कि पिता की क्या गलती है इसमें? किसलिए इतने अच्छे कवि और इतने अच्छे इंसान को भी ईश्वर ने इस दुखदायी अवस्था में रखा? और किसलिए निम्र स्तर के लोगों को भी ईश्वर अकूत दौलत से नवाजता है? मतलब यह सीधा द्वंद्व अमिताभ और ईश्वर के बीच में शुरू हो गया।

वैस अगर हम अपनी बात करें तो हमारे लिए तो 'एंग्री यंगमैनÓ का जन्म हिंदी सिनेमा के परदे पर 1973-74 फिल्म 'दीवार' से हुआ। हकीकत में 'एंग्री लिटल मैन' का जन्म तो 1954 की 5 जुलाई की मध्य रात्रि कवि हरवंशराय बच्चन के बैडरूम में ही हो चुका था। मां को रोते देख जब अमित ने अपनी मुठ्ठियां कसीं तब उनकी उम्र सिर्फ 12 वर्ष थी।

दूसरे दिन सुबह अमित के हाथ में पिता की दी हुई एयरगन (खिलौना) थी और दिमाग में विचार यह था कि, इससे पहले किसे मारूं? एक बच्चे के दिमाग में उपजा यह द्वंद्व किसी को मारने-पीटने का नहीं था, बल्कि यह वह समय था जब अमित के मन में बहुत सारा पैसा कमाने की इच्छा आकार ले रही थी। आंखें एक स्वप्र देख रही थीं और यह स्वप्र था - हाथों में लाखों रुपए होने और पिता के जेबें हीरे-मोतियों से छलका देने का।

अब बात करते हैं दूसरे प्रसंग की- यह घटना दिल्ली की है, इस बारे में तो स्वयं अमिताभ भी एक बार लिख चुके हैं। पंडित नेहरू के प्रयासों से बच्चन परिवार इलाहाबाद से दिल्ली आ गया था और अब इसके साथ ही घरखर्च भी बढ़ गया। इसलिए अब अमिताभ के कवि पिता को अपनी आय बढ़ाने के लिए कवि सम्मेलनों में भी जाना पड़ता।

पूरे दिन की नौकरी की थकान और कवि सम्मेलनों में देर रात का जागरण और इस पर भी 'दिल्ली की सर्दी'। शाम होते ही अपनी साइकिल से बच्चन घर से निकल जाते और पत्नी तेजी से कह जाते कि आने में देर हो जाएगी। मुन्ना और बंटी को खाना खिलाकर सुला देना।

बच्चन कवि का कवि सम्मेलनों में अक्सर देर हो जाने का मुख्य कारण उनकी लोकप्रियता थी और उनकी 'मधुशाला' काव्य कृति को सुनने के लिए ही लोगों की भीड़ जमा होती थी। अगर बच्चन अपनी यह कविता सम्मेलन में शुरुआत में ही सुना दिया करते तो देर रात तक भीड़ फिर रुकती ही क्यों। इसीलिए वे यह कविता सम्मेलन के अंत में सुनाया करते थे और उन्हें घर आने में अक्सर देर हो जाया करती थी।

दिल्ली की कड़कड़ाती सर्दी मे गर्म कोट पहने बच्चन ठिठुरते और दांत किटकिटाते हुए घर पहुंचते, तब तक छोटा बेटा बंटी सो जाया करता, लेकिन अमित का पिता से बहुत लगाव था, इसलिए उसकी आंखें पिता की राह देखती रहतीं। हालांकि मां के कड़क आदेश कि खाना समय पर खाना चाहिए, इस पर उनका बस नहीं चला करता, तो वे खाना तो खा लिया करते, लेकिन पिता के इंतजार में जागते जरूर रहते थे।

कवि सम्मेलनों से बच्चन अक्सर रात दो बजे तब घर आ पाते तो दरवाजा खुलवाने के लिए उंगलियों से बस धीरे-धीरे दरवाजे पर ठक-ठक किया करते। क्योंकि उन्हें लगता कि अगर दरवाजे की कुंडी बजाई तो दोनों बच्चे नींद से जाग जाएंगे। तेजी, पति का इंतजार करती रहती थीं तो हल्की सी आवाज में ही तुरंत दरवाजे तक पहुंच जाया करतीं। बच्चन अपना कोट उतारकर एक खूंटी पर टांग देते और जेब से कवि सम्मेलन में कमाए 30 या 40 रुपए पत्नी तेजी के हाथों में थमा दिया करते। इसके बाद एक लंबी सांस खींचते हुए कहते - 'ये पैसे कमबख्त बड़ी मुश्किल से आते हैं।'

लगभग 14 वर्षीय अमित ये सारी बातें-दृश्य चुपचाप लेटे-लेटे सुनता और निहारता रहता और पिता की इस जी-तोड़ मेहनत से उसे बहुत दुख होता। फिर अमित के दिमाग में यही बात आती कि काश मैं इतना पैसा कमाऊं कि पिता की जेंबे नोटों से भरी रहें और उन्हें इस तरह कठिन परिश्रम न करना पड़े। मतलब फिर उनका समाज और ईश्वर से द्वंद्व होता।

'ये पैसे कमबख्त बड़ी मुश्किल से आते हैं।'
आखिरकार समय के चक्र ने अपनी दिशा बदली.. अब अमित, अमित नहीं रहा, बल्कि पूरा देश उसे अमिताभ बच्चन के नाम से जानने लगा। पैसों की आवक नहीं, बल्कि बरसात होने लगी।

अब का दृश्य देखिएः
अमिताभ अपने बंगले (प्रतीक्षा) में पहुंचकर विदेशी कोट उतारते और उसे सौफे पर फेंकत हुए ब्रीफकेस से चालीस लाख रुपए के नोटों के बंडल निकालकर पत्नी के हाथ में देते। (यह रकम अब चार करोड़ तक पहुंच गई) और फिर प्रतीक्षा के ग्राउंड फ्लोर पर स्थित एकमात्र बेडरूम की दिशा में देखते हुए पिता का कहा गया यही वाक्य दोहराते - 'ये पैसे कमबख्त बड़ी मुश्किल से आते हैं!'

अतिम इस बेडरूम की इसलिए देखा करते क्योंकि इसी बेडरूम में कवि हरवंशराय बच्चन सोया करते थे। आज सोचता हूं कि अतिमाभ बच्चन नामक सुपर स्टार की कितनी प्रसिद्धी है... इतने सारे अवार्डस, इतनी लोकप्रियता और हिट फिल्मों की नामावली, क्या यही है बिग बी की प्रसिद्धी...?

लेकिन मैं उनकी इस प्रसिद्धि को नहीं, बल्कि उनकी जिद को ज्यादा मानता हूं, समाज और ईश्वर से हुए उनके उस द्वंद्व को ज्यादा मानता हूं जो बीस वर्ष पहले हुए था। क्योंकि बचपन में ईश्वर को दी हुई चुनौती को उन्होंने आखिरकार हकीकत में बदल डाला।

...और इसलिए वह शख्स सिर्फ अमिताभ ही हैं जिन्हें यह कहने का अधिकार है: 'पैसे आते नहीं, पैसे पैदा किए जाते हैं।'

उन पांच सालों में अमिताभ






मैंने सुना था कि कोलकाता के लोग फुटबॉल के पीछे पागल रहते हैं। इसके बाद जब मुझे यह जानकारी मिली कि अमिताभ बच्चन को पहली नौकरी कोलकाता में मिली थी, तब मेरे मन में यह सवाल उठा 'अमिताभ बच्चन इलाहाबाद से वाया दिल्ली होते हुए कोलकाता आए थे। गंगा किनारे रहने वाले इस छोरे को भी हुगली के किनारे बसे शहर का यह चस्का लगा कि नहीं?'


जवाब भी तुरंत मिल गया। अमिताभ ने जब भारत के इस सबसे बड़ी आबादी वाले शहर में पहली बार कदम रखा, उसी दिन वे टिकट लेकर फुटबॉल का मैच देखने निकल पड़े थे। दर्शक पागलों की तरह मोहन बागान टीम को चियर-अप कर रहे थे। इसी भीड़ में अमिताभ भी शामिल हो गए।


आज कोलकाता छूट गया है, वहां की नौकरियां, सखियां, नाटकों के सह-कलाकार... सबकुछ। लेकिन जो चीज आज भी उनसे दूर नहीं हो पाई, वह है फुटबाल के प्रति उनका अटूट लगाव।


अमिताभ बच्चन नामक सुपर स्टार के बारे में आज दुनिया भर के लोग थोड़ा-बहुत जानते ही हैं। लेकिन कोलकाता में बिताए उनके हसीन लम्हों के बारे में ज्यादा लोग नहीं जानते। अमिताभ ने इस शहर में 5 वर्ष का समय बिताया। और उनकी जवानी के ये श्रेष्ठ 5 वर्ष थे। मुख्य बात यह थी कि यहां वे परिजनों से दूर रहते थे। बाबूजी के संस्कार और तेजीजी के सख्त अनुृशासन की शिक्षा दिल्ली में छूट चुकी थी। अब तो युवा अमित को आगे की जिंदगी का रास्ता खुद ही बनाना था।


'बर्ड एंड हिल्जर्स' कंपनी में अमिताभ की कोयला विभाग में नियुक्ति थी। प्रतिमाह 470 रुपए की तनख्वाह हाथ में आया करती थी। कोयला विभाग का काम और अमिताभ की डिग्री बिल्कुल भी मेल नहीं खाती थी। इसके अलावा जहां भी कोयले की खदानें थीं, उन्हें वहां ट्रेनिंग के लिए जाना पड़ता था। मुख्यत: आसनसोल, धनबाद, हजारीबाग जैसे स्थलों पर उनका अक्सर आना-जाना हुआ करता था। ऐसी ही एक ट्रेनिंग के दरमियान अमिताभ खान में फंस गए थे। अचानक खान की दीवार धंस गई थी और खान में पानी भरने लगा था। लेकिन मौत के कुछ क्षण पहले ही उन्हें सुरक्षा दल ने बचा लिया।


जिन्होंने अमिताभ की फिल्म 'काला पत्थर' देखी होगी, उन्हें इस फिल्म में दर्शाया गया यह दृश्य बहुत अच्छी तरह से याद भी होगा। दरअसल यह दृश्य अमिताभ के जीवन के एक प्रसंग पर ही आधारित था।


कोलकाता में अमिताभ सन् 1963 से 1968 तक रहे। इन पांच वर्षों में उन्होंने लगभग 20 मकान भी बदले। प्रतिमाह मिलने वाली तनख्वाह वे अपने शौक में ही उड़ा दिया करते थे। सिगरेट के अलावा शराब पीना भी उनकी आदत में शुमार था।


इन 5 वर्षों की नौकरी के दरमियान अमिताभ ने कभी भी तनख्वाह से एक रुपया भी घर नहीं भेजा। इसके उलट वे तो मां-बाबूजी से खर्चे के लिए पैसे ले लिया करते थे। इसके बाद भी अमिताभ आज देश के सबसे बड़े ब्रांड एम्बेसेडर हैं। मेरे मत के अनुसार अमिताभ की प्रकृति में मौजूद दो बातों ने उन्हें आज इतनी ऊंचाई पर पहुंचा दिया है। एक तो उनका संगीत के प्रति लगाव और दूसरा अभिनय के प्रति अटूट प्रेम। खासतौर पर उत्तर भारत के लोकसंगीत की तरफ उनका झुकाव। उत्तर भारत के लोकसंगीत के प्रति झुकाव उन्हें बाबूजी से विरासत में मिला और अभिनय का शौक मां से।


किशोरावस्था में तेजी बच्चन ने कई नाटकों में जबर्दस्त अभिनय किया था। मां और बाबूजी के इन दोनों शौकों को अमिताभ ने किस तरह अपने साथ रखा, यह जानना रुचिकर है...।


नौकरी के बाद बचने वाले समय में अमिताभ ने नाटकों में भाग लेने का निश्चय किया। कोलकाता में इस समय एक 'ऐमेच्योर्स' नामक नाटक कंपनी थी। अमिताभ इस कंपनी से जुड़ गए। यहां पर अमिताभ की पहचान कमल भगत, विजयकृष्ण और डिक रोजर्स जैसे कलाकारों से हुई। प्रख्यात क्रिकेट कमन्टेटर किशोर भीमाणी भी इस नाटक कंपनी से जुड़े हुए थे। इसके अलाव यहां एक हैंडसम युवक भी था, जिसने अमिताभ को अभिनय के मामले में जबर्दस्त चुनौती दी। इस युवक का नाम था 'विक्टर बनर्जी'।


विक्टर बनर्जी अभिनय के मामले में इतने कुशल थे कि लगभग हरेक नाटकों में उन्हें श्रेष्ठ अभिनेता के खिताब से नवाजा गया और अमिताभ हमेशा उनसे पीछे रहे...।

जब इंदिरा गांधी के एक फोन से बिग बी के बॉस के छूट गए पसीने!





हिंदी सिनेमा की जानकारी रखने वालों को 'विक्टर बनर्जी' की कई फिल्में याद होंगी। हालांकि उनकी फिल्मों की संख्या ज्यादा नहीं है लेकिन उनका अभिनय इन फिल्मों में इतना जबर्दस्त रहा कि लोग आज भी उसकी सराहना करते हैं। इसी तरह की एक फिल्म 'जोगर्स पार्क' जिसने दर्शकों से भरपूर प्रशंसा बटोरी थी, इस फिल्म के नायक विक्टर बनर्जी ही थे।

 
'नि:शब्द' और 'चीनी कम' जैसी फिल्में शायद अमिताभ के मन में धीरे-धीरे पनपती रहीं इस प्रतिस्पर्धा और जलन का ही परिणाम हो सकती हैं। क्योंकि इन तीनों फिल्मों की कथावस्तु लगभग एक सी ही है। बड़ी उम्र का पुरुष अपनी बेटी की उम्र की लकड़ी से प्रेम कर बैठता है... कुछ यही बात इन तीनों फिल्मों में कॉमन थी। मतलब जो काम विक्टर बड़ी आसानी से कर सकता था, तो अमिताभ क्यों नहीं...?

 
'एमच्योर्स' नाटक कंपनी में अमिताभ की मुलाकात कई अन्य मित्रों से भी हुई, जिसमें मोहन थडानी, प्रभात बनर्जी, गोपाल और ज्योति सबरवाल जैसे नाम शामिल हैं। इसके अलावा अमिताभ को इसी बीच कई महिला-मित्र भी मिलीं, लेकिन इनका आंकड़ा जरा ऊंचा है। इन्हीं महिला मित्रों ने अमिताभ की कोलकाता की जिंदगी गुलाबी बना दी थी।

 
जवानी में अमिताभ काफी दुबले थे। इसके अलावा अपनी लंबाई के कारण वे और भी दुबले दिखाई देते थे। उनका चेहरा भी ज्यादा आकर्षक नहीं था। लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि ऐसा होते हुए भी उन पर लड़कियां जान छिड़का करतीं थीं।

 
इसका एक कारण अमिताभ की खुशमिजाजी और संगीत के प्रति उनका अटूट प्रेम भी था। वे कोलकाता में दिल्ली से एक ढोलक और एक सितार भी ले आए थे। प्रतिदिन शाम को दोस्तों की महफिल जमा करती थी, जिसमें अमिताभ ढोलक की थाप पर उत्तर भारत के लोकगीत गाया करते थे। नाच-गाने के साथ महफिल में चुटकुलों, कहानियों का भी जमकर दौर चलता था। इस महफिल में अमिताभ का सबसे प्रिय लोकगीत था...'मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है।'

 
वर्षों बाद फिल्म 'लावारिस' में यही लोकगीत अमिताभ ने खुद गाया था, जिस पर पूरा देश झूमा और आज भी झूम उठता है।

 
'बर्ड एंड हिल्जर्स' कंपनी से इस्तीफा देने के बाद अमिताभ ने कोयले की दूसरी कंपनी ज्वाइन कर ली थी। इस कंपनी का नाम था 'ब्लेक्र्स'। कंपनी के बॉस 'बोनी श्रीकांत' थे। यहां अमिताभ का पद जुनियर एक्जिक्युटिव का था। इस कंपनी में अमिताभ ने लगभग साढ़े तीन वर्ष नौकरी की।

 
ये साढ़े तीन वर्ष भी अमिताभ ने पूरी मौज-मस्ती के साथ गुजारे। दोस्तों के साथ धमाल करते हुए सिगरेट के कस खींचते हुए और शराब के घूंट उतारते हुए ही यह समय गुजरा। लेकिन इस बीच एक घटना ऐसी भी हुई, जो अमिताभ की विनम्रता, निराभिमान और सरलता को दर्शाती है...

 
अमिताभ जब छोटे थे, तबसे उनके बाएं कंधे पर गांठ की समस्या उभर आई थी। दिल्ली में इसका एक ऑपरेशन भी कराया गया था। लेकिन कोलकाता में अमिताभ की यह समस्या फिर से उभर आई। इस समय उन्हें पहले की अपेक्षा ज्यादा दर्द का सामना करना पड़ा।

 
अमिताभ ने अपने बॉस बोनी श्रीकांत को पत्र लिखकर निवेदन किया...'सर! ज्यादा दर्द की वजह से लगता है मुझे डॉक्टर से मिलना पड़ेगा। मैंने सुना है कि कर्मचारी के इलाज के लिए कंपनी खर्चा देती है...!'

 
'हां, कंपनी छोटे-मोटे खर्चों की भरपाई तो करती है लेकिन अगर ज्यादा खर्च हो तो उसका खर्च कर्मचारी को खुद ही उठाना पड़ता है। बॉस ने जवाब दिया।'

 
अमिताभ ने इलाज कराना शुरू कर दिया। लेकिन राहत नहीं मिली, बल्कि धीरे-धीरे दर्द और बढ़ता चला गया। उन्होंने फिर से बॉस से मुलाकात की...'सर, मुझे लगता है कि मुझे किसी स्पेशलिस्ट से मिलना पड़ेगा।'

 
यह बात सुनकर बॉस का मूंड तो कुछ बिगड़ा लेकिन उन्होंने यह भी महसूस किया कि स्थिति वाकई गंभीर है तो अमिताभ को हां कह दिया और डॉक्टर की फीस कंपनी की तरफ से दिलाने की सहमति दे दी।

 
कुछ दिनों बाद फिर से वही दृश्य...'सर, मुझे इससे भी बिल्कुल आराम नहीं मिला है, लगता है अब मुझे किसी दूसरे डॉक्टर से मिलना होगा।'

 
इस बार भी बॉस बोनी श्रीकांत ने मंजूरी दे दी। कुछ दिनों बाद अमिताभ फिर से बॉस के ऑफिस में दाखिल हुए और कहा...'सर, डॉक्टर ने मुझे ऑपरेशन की सलाह दी है। इसके लिए मुझे चार-पांच दिन का अवकाश और ऑपरेशन का खर्च की आवश्यकता होगी।'

 
लेकिन अब बॉस के दिमाग की कमान छूट गई... 'लुक, अमित! इनफ इज इनफ नाऊ! तुम्हें पता है कि यह कंपनी इतनी अमीर नहीं कि इतने खर्च की पूर्ति कर सके। तुम किसी स्पेशलिस्ट की जगह किसी साधारण डॉक्टर की सलाह क्यों नहीं लेते?'

 
अमिताभ ने जवाब दिया...'सर, मैं तो फुटपाथिया डॉक्टर के पास भी जाने को तैयार हूं। लेकिन मेरी 'आंटी' चाहती हैं कि मैं किसी स्पेशलिस्ट से ही यह इलाज कराऊं।'

 
बॉस ने अमित को काफी समझाया, लेकिन सब व्यर्थ! अमित इसी जिद पर अड़े रहे कि 'आंटी' चाहती हैं कि किसी स्पेशलिस्ट से ही इलाज कराया जाए। अगर मेरे इलाज के लिए कंपनी के पास पैसे नहीं तो मेरे पास भी क्या है... मैं बिना ऑपरेशन के ही काम चला लूंगा।

 
बॉस अमिताभ के सामने तो कुछ नहीं बोले... लेकिन झुंझलाते हुए मन ही मन यह जरूर कहा होगा..'भाड़ में जाओ तुम और भाड़ में जाएं तुम्हारी 'आंटी'। अगर आंटी स्पेशलिस्ट से ही यह इलाज कराने की इच्छुक हैं तो वे इसका खर्च खुद ही क्यों नहीं उठा लेतीं?'

 
दो-चार दिन बीत गए। एक दिन अमिताभ अपनी कुर्सी पर बैठकर ऑफिस का काम कर रहे थे, तभी एक वर्दीधारी व्यक्ति उनके पास आया और एक चिट्ठी उनके हाथ में थमा दी। बॉस कांच की दीवार से यह दृश्य देख रहे थे। चिट्ठी पढऩे के बाद तुरंत ही अमिताभ ने फोन अपनी ओर खींचा और एक नंबर डायल किया। बॉस यह पूरा दृश्य देख रहे थे तो उन्होंने तुरंत ही पैरेलल लाइन पर अमिताभ की बात किससे हो रही है, सुन ली। इस समय अमिताभ 'राजभवन' में किसी महिला से बात कर रहे थे...'हां जी, आंटीजी! नमस्ते आंटीजी!'

 
दूसरी तरफ से आंटीजी कह रही थीं...'तुमने अभी तक ऑपरेशन नहीं करवाया? क्या... तुम्हारी कंपनी ऑपरेशन का खर्च उठाने तैयार नहीं है? अगर ऐसा है तो छोड़ो ऐसी कंपनी को... गेट योरसेल्फ ऑपरेटेड एज अर्ली एक पॉसिबल, डॉन्ट वरी अबाउट द एक्सपेंसिज, आई शेल बेअर इट।'

 
यह बात सुनते ही अमिताभ के बॉस बोनी श्रीकांत के पसीने छूट गए और वे अमिताभ के पास आकर उनसे पूछने लगे...'हू इज दिस आंटी?'तुम अब तक कई बार अपनी 'आंटी' का जिक्र कर चुके हो, लेकिन तुमने अभी तक यह नहीं बताया कि आखिर तुम्हारी यह 'आंटी' कौन हैं?

 
अमिताभ ने नम्रतापूर्वक जवाब दिया...'सर, ये श्रीमती इंदिरा गांधी हैं, प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया'।अमिताभ ने ये शब्द इतनी शांति और भोलेपन से कहे, जैसे कि वे किसी आम महिला के बारे में बता रहे हों।

 
आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह सुनकर बोनी श्रीकांत की हालत कैसी हो गई होगी। मसलन 'काटो तो खून नहीं जैसी,' है न!

 
इतने वर्षों बाद भी यह बॉस कुबूल करते हैं कि किसी भी मनुष्य के सच्चे संस्कार उसकी कसौटी पर परखे जा सकते हैं। यह घटना कई दिनों तक चलती रही, लेकिन उसके पहले और न बाद भी अमित के व्यवहार में कोई परिवर्तन आया। वे पूरे समय सहज, विनम्र और शिस्तबद्ध रहे। प्रधानमंत्री के परिवार से उनके इतने अच्छे रिश्ते हैं, प्रधानमंत्री के पुत्र (राजीव गांधी) खुद उनके जिगरी दोस्त हैं... लेकिन अमिताभ ने इस दमदार रिश्ते के बल पर किसी भी तरह का फायदा उठाने की जरा भी कोशिश नहीं की।

 
किसी ने सच ही कहा है...'ग्रेट पीपुल डू नॉट बिकम ग्रेट विदाउट एनी रीजन'।अमिताभ 'बिग-बी'इसीलिए बन सके कि जब वे 'स्मॉल-बी'थे, उस समय भी उनमें 'बिग'बनने के गुण और संस्कार शामिल थे।

अमिताभ बच्चन - 2




नाटकों में रिहर्सल के दौरान पूरी तरह खिल उठते थे। नाटकों के अन्य कलाकारों में हर जगह वे ही छाए रहते थे। चुटकुले सुनाना, तत्कालीन प्रसिद्ध फिल्मी अभिनेताओं की नकल करना लगातार चलता रहता था। बीयर की खाली बोतलों को एक के ऊपर एक रखने के बाद अमिताभ उन पर बैलेंस बनाने की कलाबाजियां भी करते थे। कभी वे ड्रम बजाने लगते थे तो कभी देश की अलग-अलग भाषाओं के वाक्य बोलने लग जाते थे। और ये अदाएं किसी भी लड़की को लुभाने के लिए काफी थीं।

इस पर भी काम न बनें तो अमितजी के पास एक अमोध शस्त्र तो था ही। ढोलक बजाते हुए उत्तरप्रदेश के भैयाजी की लोकबोली में यह गीत.. जिसकी बीवी मोटी.. हो मोटी, उसका भी बड़ा नाम है।

अमिताभ की इन्हीं मस्त अदाओं के चलते नाटक मंडली में काम करने वाली खूबसूरत माया भट्ट लंबूजी पर मरती थी। आज भी अमिताभ के उस समय के दोस्त इस बात को स्वीकार करते हैं कि माया और उसकी बहन ज्योति दोनों ही अमिताभ की दीवानी थीं, इतनी दीवानी कि उनकी नजरें हर वक्त अमितजी पर ही टिकी रहती थी।

कुछ समय बाद अमिताभ और माया के रास्ते अलग-अलग हो गए। अमिताभ अब मुंबई आ गए थे। इधर माया भट्ट ने भी अपने मन को समझाते हुए कंपनी के एक दूसरे प्रतिभाशाली कलाकार से दिल लगा लिया। इस प्रतिभाशाली कलाकार का नाम था.. ‘विक्टर बनर्जी’। कुछ समय बाद माया और विक्टर ने शादी कर ली।

इधर अमिताभ की दोस्ती एक नई लड़की से हो गई। नाम था ‘रमोला चुगानी’। रमोला एक सिंधी लड़की थी। हर वक्त उसके होठों पर खिलखिलाहट मौजूद रहती थी। देखने में बहुत खूबसूरत, बस एक ही समस्या थी कि वह ‘ड’ का उच्चरण ‘र’ में ही किया करती थी।

रमोली की इसी बात पर अमिताभ उसका खूब मजाक उड़ाया करते थे। नाटक के सेट पर अमिताभ उससे बोलते.. ‘रमोला’, चल तो यह वाक्य बोल..‘घोड़ा गिर गया’! रमोला जवाब में कहती..‘घोरा गिर गया’..यह सुनते ही सेट पर मौजूद लोग खिलखिलाकर हंस उठते। अब तक इस मंडली में अमिताभ के छोटे भाई अजिताभ भी जुड़ चुके थे। अमिताभ और अजिताभ दोनों का रमोला से भावनात्मक लगाव हो गया और दोनों भाईयों ने रमोला को अपनी बहन बना लिया। रमोला ने कई वर्षो तक दोनों भाईयों को राखी बांधी।

लेकिन अचानक एक दिन पवित्र रिश्तों की यह बाजी पलट गई... रमोला और अजिताभ ने शादी कर ली।

अमिताभ का पहला प्रेम...

सौम्य वद्योपाध्याय नामक एक बंगाली पत्रकार-लेखक ने एक बार अमिताभ से पूछा.. मुझे पता चला है कि तुम्हारी एक खास महिला मित्र थी!

अमिताभ यह सुनते ही चौंक उठे और सिर्फ इतना ही बोले.. ‘हां!’ पत्रकार ने जब यह बात अमिताभ से उगलवाने की जिद पकड़ ली और अमिताभ से धीरे से कहा.. सिर्फ दोस्त थी या इससे कुछ ज्यादा? तब अमिताभ ने जवाब दिया.. यार छोड़ो न यह बात!

अमिताभ से जब पूछा गया ‘जयाजी के अलावा अन्य किसी महिला से आपके प्रेम संबंध थे?’ तो अमिताभ का जवाब ‘हां’ था, इसके बाद वे कहते इस बारे मंे मैं ज्यादा बात नहीं करूंगा। (रुकिए.. यह सवाल फिल्म अभिनेत्री ‘रेखा’ के संबंध मंे नहीं था) हालांकि रेखा ने कई बार अमिताभ और अपने संबंधों को स्वीकारा है लेकिन अमिताभ ने कभी यह बात नहीं कही।

अमिताभ बच्चन -1





 हिंदी सिनेमा के किसी भी कलाकार की लोकप्रियता के सही मापदंड कॉलेज के विद्यार्थियों के पास होते हैं। 90 के दशक में जब मैं कॉलेज का छात्र था, तब मेरे पास भी नायक-नायिकाओं का मापदंड था। लगभग हरेक अभिनेता को मैं और मेरे दोस्त एक सही पैमाने पर माप दिया करते थे। ‘ठंडा मतलब कोकाकोला’ की तरह हमारा मन ‘गरम मतलब धरम पाजी’ था।


इस समय प्रेम-दृश्यों के मामले में लगभग सभी अभिनेता समान ही थे। रोमांस के राजा तो एक ही थे... ‘राजेश खन्ना’। चॉकलेट भी जिसकी तुलना में कम चॉकलेटी लगे, ऐसे ‘ऋषी कपूर’ थे तो मानव जैसे किसी वानर में से निकल आया हो, ऐसे उछल-कूद करने वाले हीरो थे ‘जितेंद्र’ मतलब ‘जंपिंग जैक’।


इसके उलट एक अभिनेता... आग की लपटों की तरह, लुहार की भट्टी से निकलती ज्वाला की तरह, दुर्वासा के आधुनिक अवतार की तरह, अपनी आवाज से डराते और दहाड़ते हुए एंग्री यंग मैन थे...‘अमिताभ बच्चन’।


इस समय हमारी यह दृढ़ मान्यता थी कि अमिताभ कभी प्रेम दृश्य के रोल अच्छी तरह से कर ही नहीं सकते। और अमिताभ ऐसा करें, हम यह चाहते भी नहीं थे। फिल्म ‘आनंद’ को ही ले लीजिए, जिसमें बाबु मोशाय उनके मरीज कम डॉक्टर ज्यादा नजर आते हैं। अमिताभ पूरी फिल्म में मौन-मौन, निराश-निराश से दिखाई देते हैं, और उनके मरीज यानी की राजेश खन्ना ही उनकी हंसी उड़ाते हुए नजर आते हैं।


मुझे याद है कि उस जमाने में जब हम कभी घूमने-फिरने निकला करते थे और हमारी नजर किसी प्रेमी युगल पर पड़ती थी, अगर लड़का-लड़की से दो फिट की दूरी पर बैठे हवा में बातें करते हुए नजर आता था। तब हमारे पास एक अचूक कमेंट हुआ करता था.. ‘लो, इसका हाल तो बाबू मोशाय के डॉक्टर की तरह है।’


फिल्म ‘शोले’ में भी अमिताभ की यही छाप बरकरार रही। शाम को जय (अमिताभ) जब अपना माउथ ऑर्गन बजाते हैं तब ठाकुर संजीव कुमार की विधवा बहू जया कुछ न कुछ काम करते हुए घर से बाहर निकलती हैं और अमिताभ को देखकर शरमा जाती हैं। मुझे याद है कि सिनेमाघर में बैठी कॉलेज की छात्राएं यह दृश्य देखकर हंस पड़ती थीं।


‘इस अमिताभ को तो प्यार करना आता ही नहीं! बाकी दूसरे हीरो को देखो।’ लेकिन इसके बाद बाजी पलट गई। फिल्म ‘कभी-कभी’ रिलीज हुई और यंग्री यंग मैन अब प्रेम पुजारी बन गया दिखाई देने लगा। ‘कभी-कभी’ के प्रारंभिक दृश्य में राखी (फिल्म में उनका नाम पूजा था) के साथ उत्कट प्रेम दृश्य में अमिताभ इतने जानदार और शानदार लगे कि देश भर के युवा अपने आपको ‘अमितजी’ ही समझने लगे। इस फिल्म के बाद तो वे युवाओं के साथ-साथ युवतियों के दिलों की भी धड़कन बन गए।


कुछ वर्षो बाद फिल्म ‘सिलसिला’ रिलीज हुई। इस फिल्म के बाद तो देश के सारे प्रेमी युवा यही बोलने लगे... ‘तुम होती तो ऐसा होता, तुम होतीं तो वैसा होता...! मैं और मेरी तन्हाई अक्सर ये बातें करते हैं...!’


बात करते हैं वर्ष 1979-80 की तो अब अमिताभ के साथ एक खूबसूरत अभिनेत्री का नाम जुड़ चुका था। (फिल्म ‘सिलसिला’ इसके बाद आई थी) हर जगह चर्चा थी...अमिताभ और रेखा की।


कहां ‘आनंद’ का शुष्क बाबू मोशाय और अब वही देश का प्रसिद्ध प्रेमी पुरुष ! क्या अमिताभ की हाथ की रेखाओं में रोमांस की खूबसूरत रेखा पहले से ही थी?


शर्मिला टैगोर और अमिताभ की पहली मुलाकात...


कोलकाता में हुई एक घटना...युवा अमिताभ इस समय ‘ब्लैकर्स’ नामक कंपनी में नौकरी किया करते थे। शाम को नौकरी के बाद दोस्तों के साथ पार्टियों का दौर जमता था। इसी तरह एक बार एक पार्टी में अमिताभ की नजर एक सुंदर युवती पर पड़ी। अमिताभ उसे देखते ही रह गए। हालांकि युवती की ऊंचाई उनकी तुलना में कम थी, लेकिन वह थी बहुत सुंदर। दूसरी तरफ अमिताभ अपने दिल में स्त्रियों के लिए हमेशा ही एक गुप्त आसन बिछाए रखते थे।


अमिताभ उस युवती के पास पहुंच गए, जबकि उनके दोस्त पार्टी में अन्य लड़कियों के साथ शराब पी रहे थे, झूम रहे थे। अमिताभ ने युवती के पास पहुंचते ही पूछा...‘शैल वी डांस टुगेदर?’ युवती ने उन्हें गौर से देखा। अमिताभ के इस अचूक निवेदन को वे टाल नहीं पाई और बोली.. ‘ओह श्योर!’ अमिताभ उनकी कमर में हाथ डालकर झूमने लगे।


नाचते-नाचते अमिताभ ने युवती से पूछा... ‘क्या मैं आपका नाम जान सकता हूं?’

‘क्यों नहीं,?’ गालों में जैसे पूरा कोलकाता डूब जाए, ऐसे गड्ढे पड़े और मुंह से शब्द निकले...‘मैं शर्मिला टैगोर हूं।’


यह आसानी से यकीन न कर पाने वाली घटना है, लेकिन सच है। शर्मिला इस समय हिंदी फिल्मों में अपने पैर जमा चुकी थीं। अनेक सफल फिल्में कर चुकी थीं और उनका नाम प्रसद्धि हो चुका था। लेकिन अमिताभ उनसे ही पूछ बैठे कि ‘क्या मैं आपका नाम जान सकता हूं?’।


सुंदर स्त्री-मित्रों की कमी हमारे शहंशाह को कभी नहीं रही। कोलकाता में ही एक ‘माया’ नाम की लड़की उनके पीछे पागल थी। माया भट्ट... सिर्फ अमिताभ ही नहीं, बल्कि माया को देखने वाला कोई भी युवक उसके पीछे पागल हो जाया करता था। माया इस समय अपनी छोटी बहन के साथ ‘एमच्योर्स’ नामक कंपनी के नाटकों में रोल किया करती थी।